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हम समाज के लिए कितने उपयुक्त ये महत्वपूर्ण है।

 जीवन में हम क्या है? इससे ज्यादा हम समाज के लिए कितने उपयुक्त ये महत्वपूर्ण है।

 इस पर ही आज का समाज विचार -

             साथियों, अपने निजी जीवन में  कड़ी मेहनत और अथक प्रयासों के कारण कोई अधिकारी और कर्मचारी बनते है। व्यावसायिक क्षेत्र में कोई उद्योगपति, बिल्डर, ठेकेदार बनते है। राजनीतिक क्षेत्रो में किसीको कोई पद मिल जाता है और अन्य क्षेत्रों में भी कोई कुछ न कुछ मुकाम हासिल कर लेते है। ये सब मुक़ाम हमे आसानी से नहीं मिलते है इसके पीछे हमारी दृढ़ता, हमारी लगन और हमारी कड़ी मेहनत के कारण ये सब मुकाम हमें मिलती है। हर किसीको ये संभव नहीं है, इस बात को भी हमें मानना होगा। हम अपने नीजी जीवन में जो भी कोई मुकाम हासिल करते है, हमपर समाज और समाज के हर वर्ग को नाज होता है। हमपर समाज को नाज होना ही चाहिए क्योंकि हम उस समाज का एक हिस्सा हैं।

             यदि हम इन सब को समाज कि नजरियेसे देखते है, तो समाज को हमपर नाज तो होता है उसी के साथ समाज की हमसे कुछ अपेक्षाएं भी होती हैं। जिस तरह हमारा परिवार हमसे कुछ अपेक्षाएं रखता है, हम अपने परिवार की हर अपेक्षाओं को जिम्मेदारी से पुरी करते हैं। उसी तरह समाजद्वारा हमपर रखी गई अपेक्षाओंको पुरा करना हमारे दायित्व के हमारा कर्तव्य भी है बनता हैं।

            यदि हमे लगता है कि जीवन में हमने जो मुकाम हासिल किए है वे हमें हमारे परिश्रम, हमारा प्रयास और हमारी कडी मेहनत के कारण मिले है तो समाज को हमसे अपेक्षाएं नहीं करनी चाहिए। ऐसी किसीकी सोच होगी तो ये उनकी सोच गलत है।  क्योंकि, हमारी सफलता और जीत के पीछे समाज की प्रेरणा, मार्गदर्शन, सहयोग, आशीर्वाद, शुभकामनाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमे मिली होती हैं। इन सब बातों को हमें भूलना नहीं चाहिए। उसी के साथ समाज हमारे जन्म से लेकर हमारे जीवन की अंतिम यात्रा तक हमारे सुख और दुःख में हमारे पीछे ताकद के साथ खड़ा रहता है ये एक प्रकार हम पर समाज का कर्ज ही है। इन्हीं कारणो कि वजहसे समाज हमसे अधिकार के तौरपर अपेक्षाएं करता। समाज की अपेक्षाएं जायज भी है। क्योंकि हम समाज का एक हिस्सा है। समाज का हिस्सा होने के कारण समाज की अपेक्षाओंको पूरा करना हमारा दायित्व बनता है। हम अपने समाज कि अपेक्षाओंको कर्तव्य समझकर पूरा करना ही चाहिए। तभी हमारे जीवन को एक समाज घटक के रूप में महत्व प्राप्त होगा।

            क्योंकि अन्य किसी भी क्षेत्रो में मिले हुए पदो की सेवानिवृत्ति की आयु निर्धारित होती है। जब तक हम उन पदो पर रहते हैं, तब तक ही हमें महत्व दिया जाता हैं। जब हम उन पदो से सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तब उन पदो के साथ - साथ हमारा महत्व भी कम हो जाता है। लेकिन, हम अपने समाज के लिए अपनी कुल सेवा या अपने कुल जीवन मे से 10% भी कार्य करते हैं तो समाज हमें जो पद देता है उस पद की सेवानिवृत्ति की आयु निर्धारितही नहीं होती है। समाज से हमें जो पद मिलता वो आजीवन के लिए दिया जाता है। समाज से दिए गए पदों का हम मूल्य कर भी नहीं सकते। समाज से दिए गए पदों का महत्व हमरे लिए अद्वितीय होता है। यह शक्ति केवल समाज द्वारा दी गए पदों में ही होती है। इस बात का हमें गौर करना चाहिए। समाजद्वारा ऐसे ही पद नहीं मिलते हैं। समाज पहले उस व्यक्ति के कर्म, जुनून, काबिलीयत, संघर्ष,  निस्वार्थ सेवा और समाज के लिए किए गए कार्यो को देखकर ही दिए जाते है। इसिलिए समाजद्वारा दिए पद हमारे लिए मूल्यवान होते है। 

                 परंतु समाज कार्य करते समय हमें समाज कि ओर से कुछ मिलेगा ऐसी सोच मन मे न रखकर, हमसे समाज के लिए जितना अच्छा हो सके उतना तन, मन और धन से कार्य करना होगा।  यदि हमें तन, मन और धन से कार्य करना संभव नहीं हैं तो हमें समाज के प्रति सकारात्मक सोच रखकर मार्गदर्शन करना होगा। यदि हमको यह संभव नहीं है तो कम से कम हमें समाज के लिए अच्छे कार्य करनेवालो को समर्थन, प्रोत्साहन, आशीर्वाद या शुभकामनाएं तो भी देनी चाहिए ।

            समाज में ऐसा कोई भी घटक नहीं है जो समाज के लिए तन, मन, धन, सकारात्मक सोच, मार्गदर्शन, सहायता, प्रोत्साहन, आशीर्वाद या शुभकामनाएं इनमें से कोई एक काम न कर सके। 

             यदि हम समाज के एक सदस्य के रूप में, इन कार्यों में से कौनसे भी एक कार्य को जिम्मेदारी से स्वीकार करके अपने जीवन में से 10% भी योगदान दे सकेंगे तो निश्चितरुप से समाज हमको सही समयपर फल देता है। समाज घटक के रूप में हमारे जीवन को सार्थकता भी प्राप्त होगी। अन्यथा बहुत से लोग जीवन में आते हैं और जीवन से जाते है वे समाज घटक के रूप में समाज के किसी भी काम के नहीं होते हैं। समाज के लिए उनका जीवन निरर्थक होता है।

           साथियों समय अभी भी बाकी है। शांति से सोचो, समझो और समाज के लिए आगे बढ़ो, समाज हमारी राह देख रहा है।

समाज के लिए लड़ो ,

लड़ नहीं सकते तो बोलो ,

बोल नहीं सकते तो लिखो ,

लिख नहीं सकते तो साथ दो,

साथ भी नहीं दे तो जो लिख, बोल और लड़ रहे है,

उनका मनोबल बढा़ओ, मनोबल कम करनेका काम मत करो।

  धन्यवाद ...!

आपका साथी - श्री. अनिल रत्ने 

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