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ढाढ़ी समाज इतिहास .... History of dhadi community.




 

 ढाढ़ी समाज के बारे में जानकारी........ 

ढाढियों  का उद्भवन कैसे और कब हुआ, वे इस देश में कैसे फैले और उनका मूल रूप क्या था, आदि प्रश्नों के संबंध में प्रामाणिक सामग्री का अभाव है; परंतु जो कुछ भी सामग्री है, उसके अनुसार विचार करने पर उस संबंध में अनेक तथ्य उपलब्ध होते हैं।

ढाढियों की उत्पत्ति दैवी कही गई है। ये पहले मृत्युलोक के पुरुष न होकर स्वर्ग के देवताओं में से थे । सृष्टिनिर्माण के विभिन्न सृजनों से ढाढ़ी  भी एक उत्पाद्य तत्व रहे हैं।

           
      भारतीय  जनता को बड़े बड़े सात भागो में विभाजित किया गया है। 
                                           भारतीय  जनता

                                       १) विशेष श्रेणी     
                                      २) ग्राम समाज     
                                      ३) गौण पेशेवाला      
                                      ४) खाना- बदोश          
                                     ५) शहरी जातियाँ
                                     ६) पहाड़ी  जातियाँ 
                                     ७) पुश्तीय  जातियाँ 
                    

             उपरोक्त वर्गीकरण के द्वारा भी हम व्यवसाय प्रवृति के आधार पर भारत की जनता को वर्गीकृत कर सकते हैं । इसके अनुसार विभिन्न जातियों के कुल, गोत्र, शारीरिक लक्षण, रोटी-बेटी के व्यवहार की दृष्टि से भी हमपेशा जातियों को एक वर्ग में रखा जा सकता है।

              प्राचीन काल से ही कतिपय जातियों का संबंध राजा एवं राजदरबार से रहा है। ये जातियाँ बहुधा काव्य के माध्यम से अपना जीवन यापन करनेवाली होती है तथा इनका मुख्य कार्य राजाओं के यशोगान एवं काव्य-रचना  करना रहा है । व्यावसायिक दृष्टि से ऐसी जातियों को 'सुत जाति' के नाम से जाना गया है। 

           पुराणों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 'सुत' कुल में उत्पन्न लोग प्राचीन काल से ही देव, ऋषी, राजा आदि के चरित्रों एवं वंशावली का कथन एवं गायन का काम करते थे। वह कथा आख्यायिका, गीत आदि में समाविष्ट रहती थी। 
 
            इसी 'सुत' जाति की परंपरा में मागध, बंदीजन, बैताल बंदीजन, चंदन बंदीजन, भाट(बारहट्ट), चारण आते हैं । उपरोक्त जातियों के अतिरिक्त काव्योपजीवी इतर जातियों का उल्लेख भी है। मेघानी जी ने मोतीसार, मीर, उधिंया, ढाढ़ी एवं रावल आदि को भी चारण जातियों कि इतर जातियों के अन्तर्गत रखा है। चारणों के अतिरिक्त ब्राह्मण, राजपूत, ढाढ़ी, ढोली, (दमानी), राय, सेवक, मोतीसर इत्यादि ने भी चारणी शैली में काव्य- रचना की है। इसीलिए  इनके द्वारा रचित साहित्य को चारण साहित्य माना है।

            डिंगल साहित्य -सृजन का मुख्य श्रेय चारण जाति के साथ-साथ भाट, राय, मोतीसर और ढाढी़ जातियों को है।

'हिंदी शब्द सागर' इस तथ्य को उजागर करता है कि माखन, सूत, बन्दीजन आदि राज्य प्रशंसा ही करते थे-
अ) मागध -सुत धीर बंदीजन। 
     ठौर ठौर जस ग्वेर्नसे।। 
ब) बहु सूत माखन बंदीजन। 
    नृप वचन गुनि हरषित चले। 

           'केवल हिन्दु जातियों ने ही नहीं, अन्य धर्मांतरित जातियों ने भी कालान्तर में राज्याश्रय प्राप्त करके राजाओं की प्रशंसा की है। अतः इन जातियों को भी पेशेवर जातियों के नाते सूत संज्ञा से अभिहित किया जा सकता है। इसि दृष्टि से विचार करने पर - सूत, मागध, बंदीजन, भाट, चारण, मोतीसर, मीर, भोजक-मिरासी, ढाढी़, डूम इत्यादि को भी काव्योपजीवी जातियों के अंतर्गत रखा जा सकता है। ये जातियाँ प्राचीन काल से आजतक पीढ़ी दर पीढ़ी काव्य रचना का कार्य करती आ रही है। 

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                                 धन्यवाद....

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