फिर से जगा तेरी पहचान...
क्या गौरवशाली था तेरा इतिहास,
रूतबा था तेरा बहुतही खास,
संगित ही थी तेरी जान,
राजदरबार में था तुझे मान,
क्या खूब थी तेरी शान,
फिर से जगा, तेरी पहचान।
"सिंध" राग जब बजाता था तु,
शुरों में जोश भरता था तु,
तलवारों से लड़ता था तु,
रण - मैदान को चमकाता तु,
क्यो भुल गया तेरा अभिमान
फिर से जगा, तेरी पहचान।
ज्ञान का भंडार था तु,
प्यार भरा सागर था तु,
तेरा इतिहास है बहुतही खास,
हिमालयो में करता था तु वास,
सिंधू किनारे था तेरा स्थान
फिर से जगा, तेरी पहचान।
प्यार भरी थी तेरी "वाणी",
तेरे पुर्वज थे बहुतही "ज्ञानी"
अजबसी है तेरी "कहानी",
तु है सच्चा "हिंदूस्थानी",
खुद के गौरव को अब जान
फिर से जगा, तेरी पहचान।
धन्यवाद..🙏🙏
"समाज हिताय, समाज सुखाय"

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