ढाढ़ी समाज की अच्छाई और सच्चाई का इतिहास -
ढाढ़ी समाज एक शांतिप्रिय है। ढाढ़ी समाज हर जाती से, हर समाज से, हर धर्म से प्यार करता है। उसीके साथ - साथ ढाढी़ समाज अपनी संस्कृति से जितना प्यार करता है उतना ही प्यार वे अन्य संस्कृतियों से करते है याने कि ढाढ़ी समाज सर्वधर्म सम-भाव और भाई-चारा का संदेश देता है। यही ढाढ़ी समाज पहचान रही है।
ढाढ़ी समाज का इतिहास बहुत पुराना है, ढाढ़ी समाजद्वारा राजदरबारों में अपने ओजपूर्ण काव्य के द्वारा राजा-महाराजाओंका यशोगान करना, राज्य रक्षा के लिए वीरों की भुजाओं में फौलाद भरने के साथ - साथ खुद भी युद्धभूमि मे वीरता दीखाना, जन्म और शुभ अवसरपर अपने काव्योद्वारा गायन करना, उत्पती से लेकर जन्म से मृत्यू तक पिढी दर पिढीयोंका इतिहास रखना यहीं कार्य ढाढी समाजद्वारा है । पर ढाढी़ समाजद्वारा रखा जानेवाला इतिहास मुखबन्ध याने मौखिकरूप में पाया जाता है।
ढाढ़ी समाज के बारे में संगित - काव्य जाति, पर्यावरण की रक्षक कला साधक जातियाँ, राजस्थानी लोक साहित्यों में या अन्य साहित्यों में जानकारी मिलती है। बहुत प्राचीनकाल में ढाढी़ समाज के लोग हिमालय के आसपास ही रहते थे। कुछ समय के बाद ढाढ़ी समाज हिमालय से राजस्थान से में आकर बस गया था ।
मध्ययुग में मुघल शासकोद्वारा अन्य जाती, अन्य समाज और अन्य धर्मो के लोगोपर जबरन धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाब बनाया जाता था। ऐसा न करनेपर उनके साथ जुलूम और अत्याचार करते थे। इन वजहसें कुछ जाती के, कुछ समाज के और कुछ धर्मो के लोगों ने इच्छा न होनेपर भी डर के मारे धर्म परिवर्तन कर लेते थे। उनमे से कुछ लोग समुदाय बनाकर अपने से बडे़ समुदाय के साथ भाईचारा का नाता जोडकर रहने लगे। कुछ लोग अपना राज्य छोडकर अन्य राज्यो में जाकर बस गए। वे जिस राज्य में बस गए तभी अपनी संस्कृति के साथ - साथ वहीं कि संस्कृति अपनाकर अपने मुल कार्यानुरूप अन्य कार्ये करने लगे। इस तरह का बदलाव मुघल शासक काल में हर जाती, हर समाज और हर धर्मो के लोगो साथ हुआ है। उनमें ढाढी़ समाज भी अपवाद नहीं है। आज भी हर राज्य में ढाढी़ समाज पाया जाता है।
आज भी हर राज्य के अनुसार ढाढ़ी समाज का इतिहास जानने पर उन सभी कि मुल संस्कृति, मूल कार्य एक जैसे पाए जाते है। पर मुघल शासक काल में ढाढ़ी समाज के लोग इधर - उधर भटक गए और वे जिस राज्य में बसे तब अपनी संस्कृति के साथ - साथ वहीं की संस्कृतियों साथ अपनापन बना लिए। उसिके साथ वे जिस समुदाय के साथ जुड गए उन्हिंके साथ भाईचारा का नाता जोडकर रहने लगे। पर ढाढी़ समाज कि एक खासियत रही है की, वे जिन राज्य में बसे वहीं की संस्कृति साथ अपनापन बना लिए, वे जिन समुदाय के साथ रहे उनकी भी कुछ संस्कृति को स्वीकार किया। लेकिन अपने समाज की परंपरा, अपने समाज के कार्य और अपने समाज के सामाजिक व्यवहार अपने ही समाज के साथ करते होऊ पाए जाते है। हर राज्य के अनुसार ढाढ़ी समाज मे यहीं एक जैसा पण पाया जाता है।
ढाढी़ समाज के पास ज्ञान भंडारा होने के बावजूत भी, ढाढ़ी समाजद्वारा रखा जानेवाला इतिहास मौखिकरुप मे पाया जाता है। क्योंकि उस समय ढाढ़ी समाज में शिक्षा कि कमी होने कि वजहसे उनकेद्वारा रखा जानेवाला इतिहास लिखीतरुप में पाया नहीं जाता है। यहीं कमी ढाढ़ी एक समाज कि रही है ।
ढाढ़ी समाज के बारें मे कुछ लेखकोद्वारा वास्तविक इतिहास बताने का या लिखने का प्रयास किया गया है। पर कुछ लेखकोद्वारा ढाढी़ समाज का वास्तविक इतिहास को न जानते हुए, मौजूदा स्थिती को देखकर ही लेखन किया गया है। पर उन्होंने मौजूदा स्थिति के पीछे का इतिहास कभी समझने या जानने की कोशिश नहीं की। इसिलिए ढाढ़ी समाज का वास्तविक इतिहास पुरी तरहसे समाज के सामने आया नहीं है। इसिलिए आज भी ढाढी़ समाज के लोगों को अपने समाज का वास्तविक इतिहास को जानने के लिए दिलचस्वी दिखाते है।
आज हर एक समाज में और हर एक जाति में बड़ी संख्या में शिक्षित वर्ग हैं। जिस समाज का, जिस जाति का वास्तविक इतिहास सही तसहसे रखा नहीं गया है। उन सभी समाज के, उन सभी जाति के शिक्षित वर्ग अपने समाज का एक साहित्यिक मंच बनाकर अपने समाज का मौखिक इतिहास को समझना चाहिए। उसिके साथ अपने समाज के बारें में वास्तविक इतिहास पर लिखे गए, संदर्भ सामग्री का आधार लेकर अपने समाज का वास्तविक इतिहास समाज के सामने लाना जरूरी है। क्योंकि इसिसे समाज में जागरूकता निर्माण होगी और हर राज्य बसे हुए समाज साथि अपने समाज का वास्तविक इतिहास समझ सके । अपने समाज का वास्तविक इतिहास समझने के बाद वे एक-दुसरे का साथ जुडते जाएँगे।
अपने समाज का वास्तविक इतिहास सामने लाने के लिए एक दुसरें को सह्योंग करना चाहिए ये अपना दायित्व बनता है। इस कार्य को आगे ले जाने के लिए आप सभी का सह्योंग जरूरी है। इस कार्य को आगे ले जाने के लिए आप सभी एक दुसरो को सह्योंग करोगे ये आशा व्यक्त करता हूँ ।
धन्यवाद
जय हिंद, जय भारत...!
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