समाज को नये विचार चाहिए, निष्क्रियता नहीं.....
आज हम एक ऐसे दौर में खड़े हैं जहाँ चारों तरफ शिक्षा है, तकनीक है, संगठन हैं, युवा हैं फिर भी समाज जड़ता की जंजीरों में जकड़ा हुआ क्यो।
इतका क्या कारण है ?
हमारे चारों तरफ "समाज सुधारक" तो हैं, फिर भी समाज में सुधार क्यों नहीं है?
हमारे पास संगठन है - जो सिर्फ नाम का संगठन बनकर रह गया है। बदलाव की बातें जरूर होती हैं, लेकिन जमिन पर कुछ नहीं। न कोई सम्मेलन, न प्रतिभा सम्मान, न स्नेह मिलन - सिर्फ व्हाट्सएप ग्रुप में संदेश और मौन स्वीकृति।
व्यक्तिगत द्वेषता, जलन, खींचातान, एक दुसरे को गिराना, हानी पहुचाना, गुटबाजी करना, ये सब हम लोगों के काम हो चुके है। नेतृत्व का अभाव, और परंपरागत सोच ने इस संगठन को निष्क्रिय प्रतीक बना दिया है।
पर क्या सारा दोष सिर्फ इन संगठनों का है?
नहीं!
क्योंकि जो वर्ग बदलाव की मशाल लेकर चल सकता था, वो युवा वर्ग - वो भी अब या तो उदासीन हो गया है, या आत्मकेंद्रित।
जिन हाथों में आज क्रांति की मशाल होनी चाहिए थी, वे हाथ मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त हो गए हैं।
- युवाओं को यह समझना होगा कि सिर्फ असंतोष जताना क्रांति नहीं होती। सिर्फ आलोचना करना नेतृत्व नहीं होता।अगर संगठनों में दम नहीं तो नया मंच बनाओ। अगर पुरानी सोच आड़े है, तो नई सोच का निर्माण करो। और सबसे बड़ा प्रश्न - महिला सशक्तिकरण का हैं?
जब तक हम महिलाओं को बराबरी का मंच नहीं देंगे, उनकी उपलब्धियों को नहीं पहचानेंगे, तब तक समाज केवल एक पैर से लंगड़ाता हुआ चलेगा।
अब समय है कि हम सब - संगठन, युवा, महिलाएं और समाज के हर सोचने-समझने वाले व्यक्ति - एक साथ खड़े हों।
एक दूसरे के साथ सुख - दुख में खड़े रहे ।
अब हमें चाहिए
संगठनों में कर्तव्य की चेतना,
युवाओं में नेतृत्व की अग्नि,
समाज में समानता की नींव,
और विचारों में नवीनता का साहस।
अगर हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें सिर्फ एक निष्क्रिय पीढ़ी के रूप में याद करेंगी - जिसने सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं किया।
अब वक्त - सोचने का नहीं, कुछ कर दिखाने का है,
अब वक्त है - जुड़ने का, जागने का, और जगाने का।
✍️समाज विचारक - श्रीमान राजुजी रत्ने✍️
🙏 समाज हिताय - समाज सुखाय 🙏

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