पद्मश्री रामसिंगजी भानावतजी का जीवनकार्य.....
जिन्होंने दिल मे अपने ठान लिया था, जीवन का मकसद जान लिया था, मानवता को पहचान लिया था, समाजसेवा को ही धर्म मान लिया था। वे थे दिवंगत पद्मश्री रामसिंग फकिरा भानावतजी उनका का जन्म दि. १५ अगस्त १९०६, को महाराष्ट्र के वाशिम जिल्हे के मानोरा तहेसिल मे स्थित फुलउमरी इस छोटेसे गांव में किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी पाचवी तक कि शिक्षा गाँव के पाठशाला पुरी कि और आगे कि शिक्षा पुरी करने के लिए दुसरे गाँव जाना पड़ता था, दुसरे गाँव में जाकर आगे कि शिक्षा पुरी करने जैसी परिस्थिती न होने के कारण उनकि पांचवी तक ही शिक्षा हो पाई। स्कूल के दिनों से ही उनके मन में देश और समाज की सेवा करने की तीव्र इच्छा थी। उम्र के 20 साल से ही वे समाज सेवा कार्य के लिए जुड गए। स्वतंत्रता पूर्व काल में, वह महात्मा गांधीजी से मिले और भारत सेवक समाज में शामिल हो गए। उन्हें 1926 में भारत सेवक समाज की आजीवन सदस्यता प्रदान की गई। वे ठक्कर बानाजी, आचार्य विनोबाजी भावे, पंडित नेहरूजी, सुंदरलाल बहुगुणाजी, लाल बहादुर शास्त्रीजी, आचार्य कृपलानीजी, कमलापति त्रिपाठीजी और दादा धर्माधिकारीजी इनके साथ सामाजिक कार्य करने का संकल्प लिया। अपना पूरा समय इस सेवाभावी संगठन के उद्देशो के लिए समर्पित कर दिए । उन्होंने देश में दलितों की, गरीबों की समस्याओं और कष्टों को दूर करने के लिए अपना जीवन लगा दिया। जमींनदारो के विरुद्ध में किसान आन्दोलन, स्वाधीनता संग्राम इस तरह के समाज सेवा कार्य में स्वंय को झोक दिये थे। उनके काम से प्रभावित होकर बंजारा समुदाय के नेताओं ने इस सिद्धांत का पालन करने के लिए भानावतजी के साथ यात्रा की। भानावतजी बंजारा समुदाय के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत सेवक समाजद्वारा प्रशिक्षण लेकर, उन्होंने उस दर्शन के साथ जीवन जिया ।
स्वतंत्रता पूर्व काल में, जब अंग्रेजों का शासन था, तब ब्रिटिश सरकार ने भारत में उद्योगों को नष्ट कर दिया। औद्योगिक क्रांति ने भारत में स्थानीय कारागिरों को प्रभावित किया, बेरोजगार लोगों को हिंसक काम के लिए आकर्षित किया गया। वह लोग गिरोह में रहकर लूटपाट करने लगे। लूटपाट करनेवाले लोगो को ब्रिटिश सरकारद्वारा 'ठग' करके नाम दिया गया। 1850 तक, अंग्रेजों ने ठगों पर नकेल कस दी थी। इस कार्रवाई से उत्साहित होकर, अंग्रेजों का विरोध करनेवाले, गिरोह में रहनेवाले समाज के लिए 1871 में आपराधिक जनजाति अधिनियम बनाया गया। उन्हें वंश परांपरा के अनुसार दोषी ठहराया जा रहा था और उनपर पुलिस द्वारा मुकदमा भी चलाया जा रहा था। अधिनियम के दायरे को व्यापक बनाने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने 1871 के अधिनियम को पुनर्गठित करके आपराधिक जनजाति अधिनियम 1931 को पारित करके घुमंतू, बंजारा समान जातियों को दमनकारी शर्तों के साथ दोषी ठहराया गया। इस वजहसे खानाबदोश, बंजारा समान जातियों कि दयनीय स्थिति हो गई। रामसिंग भानावतजी ने खानाबदोश और बंजारा की कुल 197 जातियों को आपराधिक जनजातियों से मुक्त कराने के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर, राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, न. ची. केलकर, काका कालेलकर, आचार्य कृपलानी से मुलाकात की और उन्हें आपराधिक जनजाति के गंभीर मुद्दे पर ध्यान देने के लिए मजबूर किया। 80 साल के अमानवीय व्यवहार के बाद, 31 अगस्त, 1952 को स्वतंत्र भारत की संसद संसदद्वारा आपराधिक जनजाति अधिनियम को अंततः निरस्त कर दिया गया। इस अपराधिक जनजाती अधिनियम से खानाबदोश, बंजारा तत्सम समाज मुक्त हो गया।
विदर्भ कुल सेवा संघ, भारतीय आदिम जाती सेवक संघ से जुडे थे। महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वसंतराव नाईकजी तथा दिवंगत सुधाकररावजी नाईकजी के परिवार साथ उनके अच्छे संबंध थे। वे उनका अत्यंत आदर करते थे। उसीके साथ दिवंगत रणजीत नाईकजी (Ranjeet Naik), कर्नाटक के भूतपूर्व मंत्री दिवंगत के.टी. राठोडजी और सोलापुर के आदरणीय चंद्राम चव्हाण गुरूजी उनके नेतृत्व में समाजकार्य करने में खुद को धन्य एवं भाग्यशाली समजते थे।
दिवंगत वसंतराव नाईकजी और रामसिंह भानावतजी इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि शिक्षा ही सुधार, परिवर्तन और क्रांति को जन्म देती है। बंजारा समुदाय को आगे ले जाने के लिए उन्होंने भूमि, संगठन और शिक्षा के तीन सिद्धांतों को अपनाकर समाज के उत्थान की इच्छा को 1952 को कबीले कानून का निर्माण और 1953 को अखिल भारतीय सेवा संघ का निर्माण करके पूरा करने का प्रयास किया। उनके नेतृत्व में नई दिल्ली में बंजारा समाज सेवक शिबीर का आयोजन हुआ था। उस शिबीर में भारत के भुतपुर्व प्रधानमंत्री दिवंगत इंदिराजी गांधी (Indira Gandhi) एवं रक्षामंत्री दिवंगत यशवंतरावजी चव्हाण साहब (Yashwantrao Chavan) उपस्थित थे।
द्वितीय विश्व रोमानो कांग्रेस सम्मेलन अप्रैल 1978 को जिनेव्हा , स्वित्झरलैंड में आयोजित किया गया था। रोमा (जिप्सी) बंजारा इस विश्व सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल में रामसिंग भानावतजी, डाॅ. वीर राजेंद्र ऋषिजी, डॉ. श्यामसिंह शशिजी, Adv. सी. के. ठकारजी ने भाग लिया। 27 देशों के रोमा प्रतिनिधिमंडलों ने इस जिनेव्हा विश्व रोमानो सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन के अधिकांश प्रतिनिधियों ने भारत के बंजारों और यूरोपीय महाद्वीप के रोमा (जिप्सियों) के बीच ऐतिहासिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक समानता को मान्यता दी। अधिवेशन के तहत, रामसिंग भानावतजी को आठ देशों का दौरा करने का अवसर मिला, जिनमें से मुख्य इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन और स्वित्झरलैंड थे।
इस तरह दिवंगत पद्मश्री रामसिंगजी भानावत साहब ने लगभग 75 वर्षों तक निरंतर समाज की सेवा की, उनके सामाजिक कार्य के लिए उन्हें दलित मित्र एवं ‘पद्मश्री’ (Padmashree) पुरस्कार देकर उनको सम्मानित किया गया। वे एक स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन उन्होंने कभी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मानदेय नहीं लिया ।ताकि उन्होंने सन - 1971 में मिली राज्य सरकार के पुरस्कार की राशि को बांग्लादेश शरणार्थी कोष में जमा कर दिया। समाज के प्रति उनकी अटूट आस्था और निष्ठा थी। वे अपने सादा जीवन और उच्च विचार के लिए जाने जाते थे। 96 वर्ष की आयु में याने 10 जून 2002 को उनका निधन हो गया। ऐसे महान समाजसेवी को उनके ११५ वी जयंती शुभ अवसर पर शत: शत: नमन.....
धन्यवाद..! जय हिंद, जय भारत..!







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